दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है.('लस्ट फ़ॉर लाइफ़' से)
लकीर का फ़कीर नहीं बनना चाहिए लेकिन लक्षमण रेखा भी पार नहीं करना चाहिए.
मस्त रहिये, व्यस्त रहिये, लेकिन अस्त-व्यस्त मत रहिये.

Thursday, November 4, 2010

मैंने आपके पास इन्हें भेजा है.... इन लोगों का अपने घर पर दीवाली ( 5 Nov 2010) शुक्रवार को स्वागत करें.

सभी ब्लागर एवं पाठक ,
मैंने कई लोगों को आप लोगों के घर का पता आपसे बिना पूछे दे दिया है.....
मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप इन लोगों का स्वागत अपने घर पर जरूर करें.....
ये लोग संभवतः...दिनांक पांच नवम्बर ( 5th November-2010)  शुक्रवार को.....
 दीपावली के दिन आपके घर पर पहुंचेंगे.
मेरे द्वारा भेजे गए लोगों का विवरण मैं नीचे दे रहा हूँ.....
आप इनके स्वागत की तैयारी करेंगे ...ऐसा मुझे विश्वास है....
ये लोग हैं......
१) यश,
२) कीर्ति,
३) वैभव,
४) संपदा,
५) खुशी,
६) शान्ति,
७) धनलक्ष्मी,
८) एश्वर्य,
९) समृद्धि,
१०) उन्नति,
११) संतोष,
१२) प्रेम,

इन लोगों से मिलकर आपको कैसा लगा...आप मुझे जरूर बताएं.....
शुभ दीपावली... सबके लिए मंगल कामना....

Sunday, October 17, 2010

कार्य...संबंध...संतुलन...तपस्या....

जो लोग कार्य को पहली प्राथमिकता देते हैं, वे अच्छे सम्बन्ध बनाने में पीछे रह जाते हैं....


और जो लोग सम्बन्ध बनाने को पहली प्राथमिकता  देते हैं, वे कार्य पूरा करने में पिछड़ जाते हैं....


कार्य और सम्बन्ध के बीच संतुलन बनाना तभी संभव है जब आप मध्य मार्ग को अपनाते हैं....


लेकिन यह भी कई लोगों के लिए बहुत ही कठिन है....संतुलन बनाना ही असली तपस्या है..... 

Friday, October 15, 2010

धारणा....पूर्वाग्रह......मिलावट....

हम चीजों को उस रूप में नहीं देखते हैं जिस रूप में वे होती हैं...


हम उसे उस रूप में देखते हैं जैसा हम देखना चाहते हैं....


यानि हम अपनी धारणा या पूर्वाग्रह की मिलावट करके किसी चीज को उसे अशुद्ध रूपमे देखते हैं.......

Thursday, October 7, 2010

राम और कृष्ण के व्यक्तित्व में भिन्नता.....

आइये देखें राम और कृष्ण के व्यक्तित्व में भिन्नताएं इस भजन के माध्यम से.......

http://www.totalbhakti.com/members/bhajans.php?play=3774&startPostion=20&singerName=Anup+Jalota&visit=visit

Tuesday, October 5, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों पर आज भरी पड़ा क्रिकेट में भारत की जीत --मिडिया में छाया रहा क्रिकेट...

राष्ट्र मंडल खेलों के कवरेज टीवी चैनलों पर बहुत कम आ रहे हैं...
टेस्ट मैच के कवरेज पहले दिन से ही इन खेलों पर भारी पड़ रहें हैं...
कई बार विभिन्न चैनलों पर गया लेकिन मेडल टैली का लिस्ट कहीं दिखाई नहीं दे रहा....
हाँ...क्रिकेट का स्कोर-बोर्ड जरूर दिखाई पड़ा.....

Friday, October 1, 2010

अयोध्या फैसले के बाद भी कई नेता भड़काऊ बयान देने से बाज नहीं आ रहे.

अयोध्या का फैसला भारतीय जन मानस की भावनाओं को लगभग पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है...
आखिर माननीय जज लोग भी तो इसी समाज में रहते हैं....

फिर भी वोट की राजनीति के कारण कई नेता अपने बयान कुछ इस तरह से दे रहें हैं, जिसका लक्ष्य उनका वोट बैंक ही है.....

ये नेतागण ये भूल ही जाते हैं कि अब भारतीय जन मानस परिपक्व होता जा रहा है....

उनके पुराने फार्मूले अब नयी पीढ़ी पर नहीं चलने बाले हैं....

Thursday, September 30, 2010

अयोध्या का फैसला भारत के लिए एक बहुत बड़ी परख---फैसले के पीछे छुपे होंगे कई फैसले

जब आप ये पोस्ट पढ़ रहे होंगे तब तक अयोध्या पर फैसला आ चुका होगा.....
मेरे विचार से यह फैसला भारत के लिए किसी एसिड-टेस्ट (ACID-TEST) से कम नहीं होने वाला है.
इस फैसले के पीछे कई अन्य फैसले भी छुपे होंगे . इस फैसले से कई चीजों की परख भी हो जायेगी.
भारत के सभ्यता एवं संस्कृति से जुडी कई चीजों की परख इस फैसले से होगी....भले ही विवादास्पद  रह जाए....

इस फैसले से निम्नलिखित विन्दुओं की परख भी होगी :-

१) ऐतिहासिक धरोहरों के रिकार्ड रखने की व्यवस्था.
२) जमीन जायदाद के रिकार्ड रखने की व्यवस्था
३) सांप्रदायिक सदभाव का टिकाउपन
४) भारतीय संस्कृति की स्थिरता
५) भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता का प्रभाव
६) भारतीय नेतृत्व की परख
७) विदेशों में भारत की छवि
८) भारतीय न्याय-व्यवस्था की परख
९) भारत के आध्यात्मिक इतिहास की परख
१०) कानून व्यवस्था की परख

ऐसे और भी कई विन्दु होंगे जो दांव पर होंगे......
मैं भी अब फैसले का इन्तजार कर रहा हूँ...न्यायालय का भी .....और आपका भी....नमस्कार......

Wednesday, September 29, 2010

जिंदगी.....जीवन....

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है.......

आंधी या तूफ़ान से डरता नहीं है.....

तू न चलेगा....तो चल देगी राहें.....

मंजिल को तरसेगी तेरी निगाहें....

तुझको चलना होगा.....

तुझको चलना होगा.....

जांच का गणित एवं मनोविज्ञान----maths and psycology of inspection

INSPECTION

K M PRASAD, Sr. MANAGER(X),BWS, DUMPER,JAYANT,NCL

MATHEMATICAL ASPECT OF INSPECTION        
Frequency of inspection should be more than the frequency of breakdown.
·         Frequency of inspection should be more than the frequency of preventive maintenance.
·         Frequency or total number of inspection should be more than the total frequency of breakdown and frequency of preventive.
·         Number of items inspected should be more than the items mentioned in check-list during preventive maintenance.
·         Number of items inspected should be more than the number of items failed in case of any breakdown occurs, to find out consequential failure of other parts.
·         Time period of inspection should be less than shift changing time for running machine.
·         Time period of inspection should be less than Tiffin break time for running machine.
·         Time period of inspection for breakdown machine should be less than 10% of mean time to repair (MTTR), i.e. average time of repair for a particular fault, during a year.
·         Time period of inspection should be less than 25% of active repair time (ART), i.e. actual time required for repair for individual failure .
·         Time interval between inspections for a particular component should be less than mean time between failures (MTBF).

PSYCOLOGICAL ASPECT OF INSPECTION
·        
People do what is inspected, not what is instructed.
·         Truth is checked, verified and confirmed by surprise inspection only.
·         People or crews responsible for doing the work normally avoid inspection due to fear of work to be done by them.
·         People or crews responsible for doing the work normally hide the problems after inspection due to fear of work to be done by them.
·         People or crews responsible for doing the work normally hide the problems after inspection due fear of punishment for not carrying the job earlier.
·         People, who cannot do or act, take interest in either inspection or giving suggestions and direction.
·         Person not responsible for doing the work is a good inspector.
·         People do not inspect what is to be inspected, they inspect what they want to inspect.

MANAGERIAL ASPECT OF INSPECTION
·         Inspection gives information about health status of machine or component.
·         It helps in assessment of amount of work to be done.
·         It helps in planning, preparation and execution of work.
·         It helps in selecting the priority area of work.
·         It helps in better deployment of manpower depending upon the nature of job.
·         It helps in better use of low skilled manpower.
·         Early detection of minor fault helps in arresting major breakdown or consequential failures.
·         Early detection of fault provides more time for planning, preparation and execution and hence helps in arresting crisis and breakdown trap
·         It helps in cost reduction by arresting major faults.
·         Better resource management(man, material, infrastructure, time)

Tuesday, April 27, 2010

मुख्य मंत्री नितीश का दूसरा पोस्ट हिन्दी में ..http://nitishspeaks.blogspot.com

बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार का दूसरा पोस्ट उनके ब्लॉग पर हिन्दी में आया है.... पहले पोस्ट में अंगरेजी के कारण उनकी काफी छीछालेदर मची थी, खासकर उनके हिन्दी पट्टी के मुख्य मंत्री होने के कारण.... हिन्दी ब्लॉग जगत को उनसे काफी शिकायत भी थी....

उनके पोस्ट की कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं....
वे लिखते हैं--

"मेरे पहले पोस्ट के एक सप्ताह में सैकड़ों रेस्पोंस मिले हैं सच कहूँ तो इनमे से कई मेरे लिए बेहद उपयोगी और प्रेरक हैं चाहे अररिया जिला के मो राशिद रजा हों या हैदराबाद के विश्वजीत या फिर अमेरिका से सीमा ..... इन सबने उन प्रमुख बिन्दुओं का बखूबी जिक्र किया है जिनकी बदौलत बिहार में बदलाव का माहौल सुगठित होता जा रहा है।"


 "आपके संवाद मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक हैं।"


"आपकी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद बहुमूल्य रेस्पोंस भेजने के लिए मैं आपका आभारी हूँ । हर एक का जबाब दे पाना शायद मुमकिन न हो । सप्ताह भर में सैकड़ों रेस्पोंस के जरिये व्यक्त किये गए आपके विचार न केवल सराहनीय हैं बल्कि मेरे लिए बेहद अहम् हैं । इन्हें पढने के बाद मैं तठस्थ और अडिग महसूस कर रहा हूँ । इनमें बिहार को नई ऊँचाई तक ले जाने वाली लाखो प्रेरणाएं साफ़ निहित दिख रही हैं जो भविष्य में यह सुनिश्चित करेगी की राज्य में अवसरों की उपलब्धता लोगों की क्षमताओं और उम्मीदों को परिपुर्णित करे।"


"मेरे पहले ही पोस्ट पर आपके इतने सारे विचार मुझे इन्हें प्राथमिकता में रखने को प्रेरित कर रहे हैं । मेरी कोशिश है की अगले पोस्ट में मैं इन पर चर्चा करूँ ।"


अब लग रहा है कि कई हिन्दी ब्लॉगर उनके ब्लॉग पर ज्यादा विजिट करेंगे और अपना कमेन्ट भी दे सकेंगे.... 

Monday, April 26, 2010

दूध और दही से सीखें जीवन की कड़वी सच्चाई...(लड्डू बोलता है...इंजीनियर के दिल से...)

दूध की महत्ता सभी जानते हैं और दही की भी. लेकिन मैं आज दही के सहारे जीवन की कुछ सच्चाई और मैनेजमेंट एवं नेतृत्व से इसका सम्बन्ध जोड़ रहा हूँ... दूध तो पशु एवं मानव  सभी को नसीब होता है लेकिन दही मनुष्य का एक अद्भुत अविष्कार है. दूध प्राकृतिक रूप में पाया जाता है , लेकिन दही ज़माना या बनाना केवल मनुष्य के ही वश की बात है.


दूध जब अपने आप फट जाता है तो खराब हो जाता है... दूध को बचाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. बार-बार उबालना पड़ता है... या फिर फ्रिज में रखना पड़ता है..  इस पूरी प्रक्रिया में समय एवं धन दोनों खर्च होता है.. उसके बावजूद उसकी उपयोगिता एवं गुणवत्ता बरकरार रहने की गारंटी नहीं है.


जिंदगी में हर अच्छी चीजों को बरकरार रखने में ऐसी ही मेहनत, ऊर्जा एवं समय की आवश्यकता होती है. खास कर उन चीजों को जो हमें सहज, सरल एवं प्राकृतिक रूप में उपलब्ध है. 


अब दही पर आते हैं... दूध को जब हम जानबूझ कर किसी विशेष प्रक्रिया से फाड़ते हैं तो दही बनता है या जमता है.... यानि कि दूध का रूपांतरण होता है... दूध से दही बनाने की विधि केवल मनुष्यों को ही आता है.


दही में न केवल दूध के सारे गुण मौजूद रहते हैं वल्कि यह ज्यादा सुपाच्य होता है... दही में दूध से ज्यादा पौष्टिक चीजें होती हैं... यह ज्यादा टिकाऊ भी होता है.. थोड़ा खट्टा हो जाने पर भी उपयोगी होता है.. 


दही देखने एवं महसूस करने में दूध से कड़ा मालूम होता है लेकिन सभी जानते हैं कि यह गुण में दूध से हल्का एवं बेहतर होता है.


अगर आप जिंदगी में अच्छी चीजों को ज्यादा समय तक बरक़रार रखना चाहते हैं तो उसका रूपांतरण जरूरी है...दूध से दही की तरह...


दही बनाने की प्रक्रिया हमें यह भी सिखाती है कि बहुत बार किसी गुण का परिवार्तित रूप दूध फाड़ना या दही ज़माने जैसा ही  ज्यादा उपयोगी एवं कल्याणकारी होता है... अगर मकसद सही हो तो...  


जैसे शुद्ध दूध कई लोगों को नहीं पचता है वैसे ही आपका शुद्ध  गुण भी कई लोगों को नहीं पचेगा.. आप अपने विशेष गुण को दही की तरह रूपांतरित कर लें.


अगर आप अपने खूबी को दूध की तरह रखना चाहते हैं तो उसके फट जाने का खतरा आप उठा रहे हैं... 


बाहरी परिस्थितियां आपके शुद्ध गुण के  दूध को कभी भी फाड़ सकती है... आपको उसे बचाने में एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा... आप के पास समय और उर्जा कब तक रहेगी..?


अगर आप सचमुच किसी का भला चाहते हैं तो उसे दूध से दही में रूपांतरित  होने में मदद करें.


दूध की सरलता, मैनेज करने में जटिलता उत्पन्न करती है... एवं दही बनाने की जटिलता उसे न केवल मैनेज करने में सरलता का कारण बनती है वल्कि बदलाव लाकर उसकी उपयोगिता , गुणवत्ता एवं टिकाउपन को बढाती है..


जटिलता को संभालना मैनेजमेंट है लेकिन बदलाव को संभालना नेतृत्व है....

आप दही बन जाइए....  टिके भी रहेंगे,....  दूध के सारे गुण के साथ के अतिरिक्त.... और भी गुण आ जायेंगे , लोगों के लिए  न केवल सुपाच्य होंगे बल्कि स्वीकार्य भी .... बस रूपांतरण चाहिए....  शुद्ध दूध लोगों को आसानी से नहीं पचता है....





Friday, April 23, 2010

नितीश कुमार , बिहार के मुख्यमंत्री के ब्लॉग पर पहले पोस्ट में ही 580 से भी ज्यादा कमेन्ट ..4099 से ज्यादा पाठक लेकिन चिर-परिचित ब्लौगरों का अभाव...(ये तो घमासान में उलझे हैं.)

आज मैंने बिहार के मुख्य-मंत्री श्री नितीश कुमार के ब्लॉग--http://nitishspeaks.blogspot.com पर विजिट किया. पहला पोस्ट ही आया है दिनांक 19 अप्रैल को. पहले ही पोस्ट पर अब तक 580 से ज्यादा कमेन्ट आ चुके हैं. उनके प्रोफाइल पर  4100 से भी ज्यादा लोग विजिट कर चुके हैं. लेकिन सबसे ज्यादा चौकाने बाली बात यह है कि कमेन्ट देने बाले लोगों में चिर -परिचित ब्लॉगर गायब हैं.

दरअसल  अधिकांश ब्लॉगर तो यहाँ घमासान में लगे हैं कि कौन अच्छा है...कौन बुरा है..? कौन सही है..कौन गलत है..?

हम अधिकांश ब्लॉगर के साथ समस्या यही है कि जहाँ अपने विचार रखने चाहिए वहाँ तो रखते नहीं हैं... भैंस के आगे बीन बजाते रहते हैं और अपने को सबसे बड़ा तीसमारखां समझते रहते हैं... जब बिहार के मुख्यमंत्री, जो एक राज्य के नियंता हैं, के ब्लॉग पर हम अपनी बात नहीं रख सकते तो अदने-पदने ब्लॉगर के पोस्ट पर अपनी बात रख कर अपने देश का कितना भला कर लेंगे.. ?

यह बात भी हो सकती है कि हमारी या आपकी बात न सुनी या मानी जाय  लेकिन एक संभावना तो बनती ही है... फिर ऐसा अवसर कौन मुख्य मंत्री देता है कि आप अपनी बात रख सकें... ?

बिहार एक पिछड़ा राज्य है. लेकिन नितीश जी के इस तरह ब्लॉग पर आने से ब्लॉगिंग की स्वीकार्यता बढ़ेगी. मैं तो इसे बिहार में कंप्यूटर क्रांति की एक नयी शुरुआत के रूप में देखता हूँ...

आप लोग भी देखेंगे कि अब बिहार से न केवल ब्लॉगिंग में वल्कि कंप्यूटर के क्षेत्र में जल्द ही भूचाल आने बाला है...

राजनितिक तौर पर भले ही विवाद हो लेकिन यह ब्लॉग बिहार के लोगों में निश्चित ही प्रेरणा बढ़ाने वाला साबित होने वाला है...

Wednesday, April 21, 2010

मैंने भी लिया ब्लॉगिंग से ब्रेक...लिखना कम..कमेन्ट करना कम...पढ़ना ज्यादा....(लड्डू बोलता है....इंजीनियर के दिल से....)

मैंने अब ब्लॉग पर लिखना और कमेन्ट करना बहुत कम कर दिया है.....  जैसा कि मैंने पहले ही अपने पोस्ट पर इशारा कर दिया था कि भले ही ब्लॉग पर पोस्ट लिखना कम कर दूं , पढ़ना जारी रखूंगा....

मैं किसी से कोई  शिकायत नहीं कर रहा हूँ.... बस समझ लिजीये कि मैं अब लंबे-लंबे  ब्रेक के बाद ही लिखूंगा....

हाँ इस बात का मुझे अफ़सोस रहेगा कि पिछले दो -ढाई महीने में जितने भी  फोलोअर बने ,  जिन लोगों ने मेरे ब्लॉग पर विजिट किया, जिन लोगों ने मेरे पोस्ट को पसंद या नापसंद किया...  उन सभी को मेरे कम पोस्ट से तकलीफ होगी...

वैसे बहुत से लोग जो मेरे पोस्ट से नाराज होंगे या नापसंद करते होंगे , वे खुश भी होंगे...

ब्लॉगिंग एक नयी विद्या है...  इसमें बहुत संभावनाएं है... भविष्य उज्जवल है....

फुल टाइम ब्लॉगर को मैं नमन करता हूँ...  नए ब्लॉगर को शुभ कामनाएं देता हूँ...

पुराने और सफल ब्लौगरों को मैं धन्यबाद देता हूँ जिनके ब्लॉग एवं पोस्ट से मुझे काफी कुछ सीखने को मिला....  प्रोत्साहन भी मिला.... प्रेरणा भी मिली....

अंत में .... मैं ब्लॉगिंग छोड़ नहीं रहा हूँ....  कम कर रहा हूँ....  पढ़ना जारी है.... क्योंकि पिताजी ने कहा था.----पढ़ना चाहिए....

चूंकि मैं नयी-नयी चीजों को जानने -समझने का शौक रखता हूँ... अतः छोड़ने का तो सवाल ही नहीं है....

Friday, April 9, 2010

जब एक हिन्दू माँ अपने बच्चे को नमाज़ के समय मस्जिद भेज देती...भाग-तीन ( समापन)

माँ के अनुसार बच्चों  को नमाजियों के पास भेजना उसका  विश्वास  है....  वह कहती है कि अंधविश्वास तो तब होता जब वह केवल नमाजियों के ऊपर  निर्भर रहती.... या इस तरह के झाड़-फूंक पर निर्भर रहती....

वह कहती है कि बच्चो  को नजर नहीं लगेगी यह उसका विश्वास है....  अंधविश्वास तो तब कहा जाएगा जब यह कहूँ कि नज़र नहीं ही  लगेगी...

उसके अनुसार कट्टरता तब कही जायेगी जब किसी की इच्छा के विरुद्ध अगर कोई जबरदस्ती बच्चों को  नमाजियों के पास भेजे... मतलब अगर अपना विश्वास या अंधविश्वास किसी के ऊपर थोपे....

माँ के इन बातों को जब  उसके अन्य आचरण से तुलना करता हूँ तो पाता  हूँ कि-----

माँ  ने  कभी हमलोगों को मस्जिद जाने के लिए बाध्य नहीं किया....
२)     
ए  हिन्दू महिला होने के बावजूद उसने हमलोगों को घर में भी पूजा-पाठ के लिए कभी भी  बाध्य नहीं किया...  आज भी घर में किसी के  ऊपर इसकी बाध्यता नहीं है... मेरी भी रोज पूजा-पाठ करने की आदत नहीं है... केवल  विशेष पर्व-त्योहारों पर ही फूल चढाकर या अगरबत्ती जलाकर औपचारिकता  पूरी कर लेता हूँ..
३)      
 झाड़-फूंक के ऊपर मेरे घर में कतई विश्वास नहीं  है....किसी को भी...
४)      
जबकि  मेरी माँ रोज सुबह पूजा करती है... हमलोगों के नाश्ते के प्लेट में पूजा का प्रसाद  (मिश्री, तुलसी,...या अन्य पदार्थ ) जरूर रहता है...
५)     
उसका  मानना है कि पूजा –पाठ व्यक्तिगत विश्वास की चीज है... मन करे तो करो... न करे तो  न करो....

जब माँ की  अन्य बातों का, बिभिन्न पुस्तकों,  बिभिन्न  धर्मों , अन्य लोगों  के विचारों का  विश्लेषण करता हूँ तो मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि-----

नमाज की पूरी  प्रक्रिया एक तरह की ध्यान की विधि ही है....यानि...मेडीटेशन....  जिससे मनुष्य का चित्त साफ़ होता जाता है... बुरे विचार  आने कम होते जाते हैं... मनुष्य शान्ति और सदभाव की ओर आगे बढ़ता है.... अहंकार का स्तर कम होता जाता है....

माँ संभवतः इसी तरह  की साफ़ चित्त का जिक्र नमाजियों के लिए करती है....  हिन्दू धर्म और अन्य  धर्म में भी बिभिन्न प्रकार के मेडीटेशन या ध्यान के ऊपर इतिहास में जोर रहा है...

मजे की बात यह है कि  सभी धर्मों में मेडीटेशन  को लेकर कोई  मतभेद नहीं है... विधियाँ भले ही अलग अलग हो... पद्धति भले ही अलग अलग हो... इस्लाम  में भी ऐसा ही है... यही कारण है कि इस्लाम में भी निराकार पर जोर  है...

इस्लाम की शुरुआत  करीब चौदह सौ साल पहले हुई , यानि हिन्दू और ईसाई धर्म के बाद... इसीलिये हमारे  हिन्दू पूर्वज नमाज को ध्यान एक नयी की विधि मानते रहे हैं..  यही कारण है कि नमाजियों के प्रति हिंदुओं में  श्रद्धा होती है... भले ही उनकी जीवन पद्धति अलग हो गयी हो.... मेरी माँ भी ऐसे ही  पूर्वजों का प्रतिनिधित्त्व करती है.... जिसने अपने पूर्वजों से सुना होगा या सीखा होगा.... या केवल देख कर ही मान रही होगी....

दरअसल प्रायः ऐसा  होता है कि हमलोग अपने बाप-दादाओं के विचारों को, उपदेश को, सीख को बिना  हील-हुज्जत के मान लेते हैं... मानने का मुख्य कारण उपदेश या विचार  की गुणवत्ता पर नजर कम  होती है... उनके परवाह या केयरिंग के ऊपर ज्यादा  होती है.... कि वे जो बताएँगे या करेंगे,  भले के लिए ही करेंगे....

वही उपदेश जब दुसरे  देते हैं और उनमे परवाह या केयरिंग का भाव नहीं होता है तब हमें मानने में परेशानी  होती है...

ध्यान देने बाली बात  यह भी है कि ---
वेद का अर्थ है—  “ जो कहा गया है...”
कुरआन का भी अर्थ  है---  “ जो कहा गया है...”

मजे की बात है कि ये  जो धर्म ग्रन्थ हैं, धर्म प्रवर्तकों द्वारा बोले गए हैं....,   उनको लिपिबद्ध उनके साथियों या अनुयायिओं ने  किया है....

अब सोचिये, बोलने  में शब्दों का उतर-चढाव होता है....  हाव-भाव में उतर-चढाव होता है... किसी शब्द पर ज्यादा जोर , किसी वाक्य पर ज्यादा जोर ....इत्यादि... इत्यादि...होता है...

अब उसी को लिपिबद्ध  करने से उसके ये सारे भाव कहाँ से आयेंगे.... फिर प्रसंग के अनुसार शब्दों के अर्थ  बदल जाते हैं.... आज नए सन्दर्भ में पुराने अर्थ कैसे काम आयेंगे..?
जब धर्म प्रवर्तक  बोलते होंगे , तब निश्चित ही उनके अंदर केयरिंग का भाव रहता होगा....  नहीं तो इतने सारे अनुयायी हो ही नहीं सकते  हैं....

धर्म-ग्रंथों की  रचना के बाद और आज के तथाकथित बिभिन्न धर्मों के विद्वान लोगों ने इतनी ज्यादा और  अलग तरह की व्याख्यायें दे चुके हैं कि पढ़े-लिखे लोग ही सबसे ज्यादा भ्रमित  हैं.....  मेरी माँ जैसे लगभग अनपढ़ लेकिन  समझदार लोग धर्म के मामले में कतई भ्रमित नहीं हैं.... लेकिन पढ़े-लिखे नासमझ लोगों  की भी कमी नहीं है....

हिन्दू प्रार्थना  करते हैं....  मुस्लिम नमाज अदा करते  हैं....
अब अर्थ  देखें....  दोनों का एक ही अर्थ  है....  भगवान या अल्लाह को धन्यबाद या शुक्रिया अदा करना...
अब तो अर्थ ही बिगाड़  दिए गए हैं... लोगों ने “माँगना” मान लिया है....

वल्कि नमाज की  बिभिन्न मुद्राएँ अलग अलग तरह की योग मुद्राओं का मिश्रण भी है....., जिससे नमाज  एक तरह का पॅकेज बन जाता है जो  तन, मन और  चित्त तीनों के लिए है...
इस्लाम के मूल में  ही प्रेम और भाईचारा का सन्देश है...

इस्लाम का अर्थ ही  है—“ अल्लाह को स्वीकार और समर्पण...यानि अल्लाह मुझे स्वीकार करें...मैं अपने  आपको समर्पित करता हूँ...

कालांतर में , समय  के साथ सभी धर्मों  में  ह्रास हुआ है,... अहंकार में कमी आने की बजाय भाव में कमी आई है, बिभिन्न अर्थ दिए जा रहे हैं लेकिन भावार्थ गायब है..... पूजा , प्रार्थना, नमाज , साधना में औपचारिकता निभाई जा रही है... धर्म  का मूल भाव अंधविश्वास और कट्टरता ने लेना शुरू  कर दिया है...

अंत में मैं शरद कोकास के दिए कमेन्ट से इस  पोस्ट का समापन  करना चाहूंगा......
“कुछ  सवालो के जवाब नही ढूंढे जाते तो यह वैमनस्यता ही नही होती” 

धन्यबाद...

Thursday, April 8, 2010

जब एक हिन्दू माँ अपने बच्चे को नमाज़ के समय मस्जिद भेज देती...( भाग-दो )

मुझे याद है , मेरी  माँ, जो एक हिन्दू महिला है, शुद्ध शाकाहारी परिवार, शाम के नमाज़ के समय घर के गोद  वाले बच्चों को भी, बड़े बच्चों के साथ मस्जिद भेज देती थी. रोज तो ऐसा नहीं होता  था, किन्तु प्रायः होता था....
अजान से माँ को नमाज़  के समय का पता चल जाता....  वो शाम को  बच्चों को भेज देती...  वहाँ मोहल्ले के और  भी हिन्दू  परिवारों के बच्चे भी आते....

यहाँ मैं  समीर जी (उड़न तश्तरी ) जी के कमेन्ट का जिक्र करना चाहूंगा जो उन्होंने पिछले  पोस्ट में लिखा है—“  यह घर घर की कहानी हुआ करती थी.”...  

हमलोग मस्जिद के गेट  पर ही खड़े रहकर नमाजियों के निकलने का इन्तजार करते....    छोटे बच्चे गोद में रहते....  नमाजी जब बाहर निकलने लगते तो सारे बच्चों के  ऊपर हवा में दो-तीन बार हाथ फेरते,.. चुटकी बजाते,... फिर फूक मार देते....  मुझे याद है कि जितने भी बुजुर्ग नमाजी होते वे  प्रायः ऐसा सभी बच्चो के साथ बारी-बारी करते थे....
जैसे-जैसे बच्चो की  उम्र ज्यादा होती गयी, माँ या चाची  भेजना  कम कर देती...  कहती थी कि छोटे बच्चों को ही  जाना है...जो बड़े हो गए हैं उनको जरूरी नहीं है....
उसके बाद हमलोग घर आ  जाते.. बहुत छोटे बच्चों को घर में छोड़ कर फिर खेलने चले जाते....
माँ और चाची ऐसा  क्यों करती थी..?
माँ और चाची के  अनुसार , नमाजी जब नमाज पढते हैं तब वे भगवान ( वे अल्लाह नहीं कहती..! ..खैर क्या  फर्क पड़ता है..? ) के सबसे निकट होते हैं... उनका मन साफ़ होता है... उनका चित्त साफ़ होता है...
माँ के अनुसार छोटे  बच्चे (माँ दुधमुहें बच्चे को फोहावा या फलिस्ता बच्चा कहती... जो विल्कुल कोरे  एवं नासमझ होते हैं...ये शब्द अभी भी बिहार के देहाती इलाकों में प्रयोग किया  जाता है..) भी भगवान के सबसे निकट होते हैं... उनका मन भी साफ़ होता है... उनका भी  चित्त साफ़ होता है...
माँ के अनुसार वे  बच्चो को भगवान से मिलने भेजती हैं....  इससे उन्हें नजर भी नहीं लगती है.... बुरे साये से दूर रहतें हैं.... 
माँ का यह भी कहना  है कि नवजात बच्चे नींद में तभी मुस्कुराते हैं जब उन्हें भगवान के दर्शन होते  हैं.....  और वे तभी डरते हैं या नींद में  ही रोने लगते हैं जब उसे शैतान के दर्शन होते हैं....
शैतान या बुरे साये दूर  रहें इसलिए वे ऐसा करती थीं....
पिछले पोस्ट के  कमेन्ट में तारकेश्वर गिरि जी का भी यही कहना है --  “किसी की नजर ना लगे इसीलिये बच्चे नमाज के समय  जाते थे....” लेकिन वे साथ में यह भी कहते हैं – “ एक तरह का अंधविश्वास ही है..”

....थोड़ी  उम्र बढ़ने पर मैं माँ और चाची से क्या पूछता  था..?
१)...एक प्रश्न तो  वही था जो जो गिरि जी ने कहा-----  “ क्या  यह अंधविश्वास नहीं है..?”
२)...क्या सच में  भगवान दिखाई देते हैं...? 
३)...क्या सच में  शैतान दिखाई देता है...?
४)...क्या सच में  नज़र लगती है...?
५)...सच में शैतान  भाग जाता है...?
आज भी मुझे याद है  कि मेरी माँ , जिसने कभी स्कूल में  विधिवत  शिक्षा नहीं ली है, बहुत ही कम पढ़ी-लिखी है, अपने मायके में जिसने कभी मस्जिद भी  नहीं देखा .... मेरे प्रश्नों के उत्तर  सहजता और सरलता से देती थी....


उसके बातचीत से  मुझे विश्वास , अन्धविश्वास और कट्टरता में  जो  अंतर समझ में आया ....वह आज भी  कई बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे लोग भी नहीं  समझते हैं....



माँ की बातें...और मेरा विश्लेषण भी....अगले पोस्ट में..... अन्य ब्लौगरों के कमेन्ट के भी विश्लेषण साथ में....

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