आज २१ मार्च को भारत रत्न “ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान” की जयन्ती है. लेकिन समाचार-पत्रों तथा न्यूज चैनलों से हमारे उस्ताद करीब-करीब गायब कर दिए गए हैं. यहाँ तक कि वाराणसी , जो उस्त्ताद की कर्म-भूमि रही है, से प्रकाशित “ दैनिक हिदुस्तान “ में एक लाइन का भी समाचार नहीं था.
आज सुबह ही मैंने अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट डाला –“सास का ओढना बनता है पतोहू का नक्पोछना. इस कहावत का अर्थ है -“ एक पीढ़ी के धरोहर अगली पीढ़ी के लिए बेकार होते हैं या कहें कि अगली पीढ़ी के लिए वे बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते हैं.” सास के लिए जो ओढना बहुत महत्वपूर्ण है, दिल के करीब है, अजीज है....वो पतोहू के लिए नाक पोछने योग्य ही माना जाता है.....यही होता है.....कड़वा सत्य.....
मैंने बचपन से आज तक उस्ताद की जो छवि अपने मन में बसाई है, वो यह है कि पहली बार सही मायनों में भारत रत्न अवार्ड खुद सम्मानित हुआ था जब उस्त्ताद को यह उपाधि दी गयी.
इस पोस्ट को लेकर मुझे फिर आना पड़ा , कुछ नए सन्दर्भ में..........
मैं धर्म की बात नहीं कर रहा.....मैं प्रतीकों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ.....अगर मैंने कुछ कच्चे- पक्के धारणायें बना ली हो तो आप सुधार के लिए सुझाव दे सकते हैं....
जीसस का क्रॉस मृत्यु का प्रतीक है.....
क्रॉस जीसस का चुनाव नहीं था.....वो उनकी मजबूरी थी.
उन्हें क्रॉस पर लटका दिया गया था....जीसस के क्रॉस से जिस सभ्यता और संस्कृति की शुरुआत हुयी है , वह एटम बम और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप आतंकबाद के रूप में सामने है.....
जीसस जन्म से यहूदी थे...उनकी मृत्यु के बाद “ क्रिश्चयन” धर्म की शुरुआत हुयी....
लेकिन जीसस का बलिदान और क्रॉस के अर्थ बदल गए है.....या कहें तो जीसस के जाने के बाद लोगों ने उनके प्रतीकों को समझा नहीं ठीक से......लोगों ने उस अर्थ को अहमियत दी जो जीसस को क्रॉस पर लटकाने बाले देना चाहते थे......
कृष्ण की बांसुरी उनकी मजबूरी नहीं थी.....वह उनका चुनाव था.....कोई क्रॉस की तरह बांसुरी को किसी पर थोप नहीं सकता....
बांसुरी को चाहिए होंठ.....जिन्दा होंठ.....
बांसुरी को चाहिए नाचते....गाते होंठ.....
ये नाचते ...गाते होंठ तभी संभव है जब आपके अंदर आनंद और उल्लास हो......
लेकिन समय के साथ कृष्ण की बांसुरी के अर्थ भी बदल दिए गए हैं....
नाच है...गाना है....लेकिन अंदर से आनंद और उल्लास गायब हो गए हैं.....
उसकी जगह पाखण्ड ने ले लिया है.....
बाबाओं ने धर्म को गन्दा कर दिया है.....
अब रही बात हमारे भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के शहनाई की......
उस्ताद का पसन्दीदा जगह थी ......वाराणसी का गंगा घाट....घाट के किनारे के मंदिर......मस्जिद......
वाराणसी की सुबह...और ...मंदिर की आरती....मस्जिद का अजान......उस्ताद की शहनाई वादन के बाद ही शुरू होती थी....वे घंटों शहनाई वादन करते.......
कहते हैं....उस्ताद ने अमेरिका में बसने का न्योता इसलिए ठुकरा दिया था कि.......वहाँ मंदिर और मस्जिद तो बन जाते..... लेकिन “गंगा “ को ले जाना संभव नहीं था.....
शहनाई उस्ताद की मजबूरी नहीं थी......उनका चुनाव था.....
वे वाराणसी में जन्मे नहीं थे....उनका चुनाव था वाराणसी....
मंदिर....मस्जिद.....और गंगा.....उनके चुनाव थे......
उन्होंने शहनाई को खुशी का प्रतीक बनाया....उसे अपनी साधना से इतनी ऊँचाई पर पहुँचाया कि पूरा विश्व चकाचौंध हो गया.....
और उनकी सादगी.....उन्हें शत्-शत् नमन.......
आज हम न् केवल उस्ताद को भूल गए हैं ....उनके प्रतीक को भी भूल गए है....
सर्व धर्म सम भाव की पराकाष्ठा कोई उनसे सीखे.....
जमीन पर रहना कोई उनसे सीखे.....




9 comments: