दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है.('लस्ट फ़ॉर लाइफ़' से)
लकीर का फ़कीर नहीं बनना चाहिए लेकिन लक्षमण रेखा भी पार नहीं करना चाहिए.
मस्त रहिये, व्यस्त रहिये, लेकिन अस्त-व्यस्त मत रहिये.

Sunday, March 21, 2010

सास का ओढना बनता है पतोहू का नकपोछना...

इस कहावत का अर्थ है -“ एक पीढ़ी के धरोहर अगली पीढ़ी के लिए बेकार होते  हैं या कहें कि अगली पीढ़ी के लिए वे बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते हैं.” सास के लिए जो ओढना बहुत महत्वपूर्ण है, दिल के करीब है, अजीज है....वो पतोहू के लिए नाक पोछने योग्य ही माना जाता है.....यही होता है.....कड़वा सत्य......

भारत के जन जीवन में कहावतों का बहुत प्रयोग होता है. कहावतें जीवन के अनुभव का निचोड़ होते हैं. यह व्यबहार के धरातल पर  साबित होने के कारण ही दुनिया और समाज में लोकप्रिय होता जाता है. यह लोगों के  बोलचाल से ही जन्म लेता है....यह पहले प्रयोग में आता है फिर ये पुस्तकों में अपना  स्थान पा लेते हैं....

कहावतें जीवन के सच्चे तथा कड़वे सत्य को बयान करते है. हम दावे के साथ  कह सकते हैं कि ये शाश्वत सत्य होतें है. आज के पोस्ट को मैंने यह शीर्षक इसलिए  दिया है कि जरा इस कड़वे सत्य से एक बार फिर रूबरू हो जाया जाए.

आज शहनाई उस्ताद , भारत रत्न –“स्वर्गीय बिस्मिल्लाह खान “ की जयन्ती है.......२१ मार्च....

आज सुबह से ही मैंने कई न्यूज चैनलों पर छान-बीन की. किसी भी  राष्ट्रीय कहे जाने बाले चैनलों पर एक भी समाचार उस्ताद के बारे में नहीं दिखा....चाहे  वो “सबसे तेज” का दावा करें , “आपको रखे सबसे आगे”  या कोई भी विशेषण जुड़ा हुआ अन्य टीवी चैनल  हों.... इन्हें ज़रा भी शर्म नहीं है....दो लाइन का न्यूज नहीं दिखा सकते.....दोपहर  के दो बजे तक केवल “इ-टीवी, यूपी..और बिहार “ पर ही न्यूज आये....दो-तीन मिनट के...

किसलिए भारत रत्न ?....किसका भारत रत्न ?...क्यों ?.....

लेकिन प्रश्न उठाने का कोई मतलब भी नहीं है....वही कड़वा सत्य.....

लेकिन प्रश्न है......?

अभी उस्ताद को सुनी पीढ़ी मौजूद है....अभी पीढ़ी बदली नहीं है.....

हम बापू, शास्त्री, नेहरू, गांधी, लोहिया, जेपी, भगत सिंह, आजाद,...के  जमाने के नहीं हैं.......

लेकिन उस्ताद के जमाने के तो हैं ही.....

यही हाल रहा तो हम “लता दीदी” को भी भूलने में देर नहीं करेंगे.......

फिर....सचिन को भारत रत्न देने की मांग करने बाले उसकी भी ऐसे ही  बे-इज्जती करेंगे......

आज टीवी चैनलों पर छाया रहा---आई.पी.एल. की बोली, क्रिकेट, रानी मुखर्जी का जन्म दिन....और न जाने क्या—क्या....

हे भारत के महापुरुषों....हमें माफ करना....

हमारी याददाश्त गजनी फिल्म के आमिर खान की तरह हो गयी है....

अब अगली पीढ़ी दस साल में नहीं आती.....

अब तो नयी पीढ़ी दस दिन में आ जाती है....

हम तुम्हें दस दिन भी याद नहीं रख पायेंगे.....

हमें माफ करना........

हो सकता है.....रात को सोते समय याद रहे....
सुबह...तुम्हारा ओढना...हमारे नाक पोछने के काम में आ जाएगा....

हमें माफ करना....
कहावत तो आप ही छोड़कर गए हैं न ....आप तो अच्छी तरह समझते हैं.....

सास का ओढना.....पतोहू का नक्पोछना.....

कड़वा सत्य....शाश्वत सत्य......

9 comments:

  1. कड़वा सत्य....शाश्वत सत्य......
    bilkul sahi
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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
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  3. सार्थक पोस्ट है...एक कटु सत्य को उजागर कर रही है...उचित आशंका जताई है आपने,,,,
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  4. हमारी स्मृति आधीन हो चुकी है इलेक्ट्रोनिक्स और तकनीक के ,जब तक reminder ना बजे तो जन्मदिन याद नहीं आते
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  5. मैं तो ये कहावत भी पहली बार सुन रहा हूँ.. हाँ पर अर्थ ज़ाहिर है एक दम आसान. भारत रत्नों का यही सम्मान है जो आप देख रहे हैं हाँ अगर सोनिया का जन्मदिन होता तो संसद से १० जनपथ तक कारों और 'फूलों'(दोनों तरह के फूल) का काफिला सजा होता.
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  6. सास का ओढना.....पतोहू का नक्पोछना.....

    कड़वा सत्य....शाश्वत सत्य...

    आपसे सहमत।
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  7. अब अगली पीढ़ी दस साल में नहीं आती.....


    अब तो नयी पीढ़ी दस दिन में आ जाती है....


    हम तुम्हें दस दिन भी याद नहीं रख पायेंगे.....

    सही कहा आपने .....!!

    पर लता दीदी इनमें शामिल नहीं हो सकती ...!!
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  8. bahut achchee baat kahee aapne....
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